yantra / chart artwork
traditional painting
portrait photo
seated portrait
with guru / group photo
rangoli / floor art
सत्य की खोज -
संसार नहीं बदलता, हमारी दृष्टी बदलती है।
और हम दृष्टी को ही सत्य मान लेते हैं।
3 बिंदु में पूरा भ्रमजाल
1. घटना एक, दृष्टी दो
एक ही घटना को कोई संकट कहता है, कोई अवसर।
कोई संसार में दुःख देखता है, कोई सुंदरता।
प्रश्न: सत्य बदल रहा है या दृष्टी? उत्तर: दृष्टी।
यहीं से भ्रम शुरू होता है - जब दृष्टी और सत्य का फर्क मिट जाता है।
2. दृष्टी उधार की है
हम बचपन से परिवार, समाज, शिक्षा, अनुभव की परतें पहन लेते हैं।
फिर संसार को सीधा नहीं देखते, उन परतों से देखते हैं।
समस्या: जब हम अपनी दृष्टी को ही "अंतिम सत्य" मान लेते हैं।
"मैं जैसा देख रहा हूँ, वैसा ही है" - यही भ्रम है।
3. सत्य वैसा नहीं है जैसा हम देखते हैं
एक को आकाश में खालीपन दिखता है, दूसरे को अनंत संभावनाएं।
एक ही व्यक्ति किसी के लिए प्रेम है, किसी के लिए दुःख।
गहरी बात: हम संसार को वैसा नहीं देखते जैसा वो है।
हम उसे वैसा देखते हैं जैसे हम हैं।


